🗳️ "ये NRC से भी ज़्यादा खतरनाक है" — ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के नए नियमों पर जताई कड़ी आपत्ति
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई "स्पेशल इंटेंसिव रिविजन" प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया नागरिकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है और इससे आम जनता का वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है।
🔍 क्या है यह नया नियम?
चुनाव आयोग ने हाल ही में एक विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया लागू की है, जिसके तहत:
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जिन नागरिकों का नाम 1 जुलाई 1987 से पहले की मतदाता सूची में नहीं है, उन्हें स्वयं का जन्म प्रमाणपत्र देना होगा।
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जिनका नाम 1987 से 2004 के बीच जोड़ा गया, उन्हें अपने माता या पिता में से किसी एक का जन्म प्रमाण देना होगा।
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और जो 2004 के बाद मतदाता बने हैं, उन्हें माता-पिता दोनों का जन्म प्रमाणपत्र देना होगा।
यह प्रक्रिया पहले बिहार में शुरू की गई है और आगे इसे अन्य राज्यों में भी लागू करने की तैयारी है।
❓ ममता बनर्जी का सवाल
ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया की तीखी आलोचना करते हुए कहा:
"अगर किसी ने 1987 से पहले जन्म लिया है तो क्या वह भारत में पैदा नहीं हुआ? क्या हम सब विदेशी हैं?"
उन्होंने कहा कि 40-50 साल पहले जन्म प्रमाणपत्र बनवाना आम नहीं था। खासकर गांवों और गरीब परिवारों में तो जन्म सरकारी रजिस्टर में दर्ज ही नहीं होता था।
"मेरे अपने माता-पिता के पास भी कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं था। तो फिर ऐसे दस्तावेज की मांग कर, क्या सरकार आम नागरिकों को ही गैर-कानूनी ठहराना चाहती है?"
⚠️ "यह तो NRC से भी खतरनाक है"
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह प्रक्रिया NRC (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) से भी ज़्यादा खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि इसका दायरा और असर कहीं ज़्यादा व्यापक होगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि इससे:
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गरीबों,
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ग्रामीणों,
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प्रवासी मजदूरों,
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और ऐसे लोगों जिनके पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं,
के वोटर लिस्ट से नाम कटने का खतरा बढ़ जाएगा।
📢 चुनाव आयोग से ममता की अपील
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से अनुरोध किया कि:
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यह प्रक्रिया तुरंत स्थगित की जाए।
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कोई भी ऐसा नियम लागू न किया जाए, जिससे आम नागरिकों की वोटिंग योग्यता पर सवाल उठे।
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लोगों को डराने या अस्थिर करने की बजाय, सरल और भरोसेमंद प्रक्रिया अपनाई जाए, जिससे वंचितों को भी न्याय मिल सके।
📌 निष्कर्ष
इस पूरे विवाद में एक बात साफ है — यह मामला सिर्फ दस्तावेज़ों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और भरोसे का है। अगर लाखों आम लोग सिर्फ इसलिए वोट नहीं दे पाएंगे क्योंकि उनके पास दशकों पुराने दस्तावेज़ नहीं हैं, तो सवाल उठना लाज़मी है।
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